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Innocence is the Fruit of Childhood

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People today have many faces

leading lives without any traces

there’s no one face anymore

it was only, when they were four

when their face was bright as sunshine

things brought smile were less than a dime

they eat, drank and played with everyone

but now keep looking for that, some ‘one’

they loved everyone without a thought

hugged each other even when they fought

to them now adds each year

a different face with a thick layer

the face of smartness and desperation

in search of millions to joy and recreation

wishing every day to go back in years

tired of guilt and living in fears

longing everyday to be happy like a child

searching for innocence among the wild

this is what people are doing today

forgetting their roots and old play

though none can pierce into the thick

that is thickened each year with a new trick

so once all grown cannot be rooted out

tentacles grow in us just as the sprout

still there’s something even if we ‘re done

out of so many faces just pick any one

My Darling 498 a

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अकेला क्या दुखी कम था “मैं”
जो जुड़ी मुझसे एक और “मैं”Image
“मैं” कहाँ अब बन गया था “तू”
और इस “तू – मैं” में मिला ना कोई क्लू

जिसके ख्वाब देखे सपने सजाये
वो मेरे दर पर दरोगा साहब को ले आए
कभी जो कहती थी “डार्लिंग” प्यार से
अब बदला लिवा रही है वो मार-धाड़ से

दुखी, बेमन, बोझिल अंतरमन को संभाले
रिश्तों का उलझता ताना बना सुलझाते
थक चूका हूँ मैं अब इस बर्बादी से 
तौबा करता हूँ मैं इस शादी से

बनाकर लाया था जिसको मेरे घर की लक्ष्मी
अब डालेगी डकैती बनकर कुलक्ष्मी
कहाँ छुटकर जाऊं इस कोर्ट कचहरी से
लाइलाज बन चुकी हैं बीमारी अब 498 a 

कोई समझाए मेरी प्राणप्रिय धरमपत्नी को
क्यों मेरे प्राणों की प्यासी बन चुकी हैं वो 

सोचता हूँ क्यूँ कहा था कभी मैंने उसे ऐसा
की डार्लिंग क्यूँ खर्चती हो इतना सारा पैसा ?
मेरी आमंदनी  है अट्ठन्नी और तुम खर्चती हो रुपईय्या 
इतना कहने पर ही तुमने डूबा दी मेरे अरमानो की नईय्या
 

जो ना किया सितम उसपर तो मिली सज़ा फिर क्यूँ
“आप”,” तुम” कहते करते कब बन गया ” मैं” से “तू” 

मुझे फूलों की माला पहनाने वाली, मेरे जीवन का प्यार
बना गयी 498a ,dv, crpc 125 अब मेरे जीवन का सार

क्यूँ जानकार सब बनती हैं अनजान
मुझसे ज्यादा तुझे है सच्चे इंसान की पहचान