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Mehfil e Zindagi

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यह ज़िन्दगी की महफ़िल ….

 

अब कहाँ ….

शाम ए महफिले सजा करती है

हर तरफ बदरंग सी कोई नुमाइश लगती है

ना कहीं सुर है ना कोई साज़

हर तरफ सिने में छुपा रहा कोई राज़

 

क्यूंकि …

 

दिखावा करती यह दुनिया बरसो से चली

दिखावे के बिना अब कहाँ कोई शाम ढली

दिखावो में सिमटा हुआ हमसफ़र

दिखावटी ज़िन्दगी का छोटा सफ़र

 

इस …

 

चकाचौन्द में डूबा हुआ मन

हुआ बोझिल सा हर अन्तरंग

किसे देखे किसे बताये

की इस मन की क्या है आशाए

 

क्यूंकि

 

ना अब फुर्सत ना कोई विरासत

क्यूँ दे कोई अब अपना वक्त

किसको परवाह, कौन हो तुम

ढूँढेगा कौन हो गए अगर गुम

 

तो

 

यह महफिले ए ज़िन्दगी है जनाब

समझाना छोड़ दीजिये इसको ख्वाब

हकीकत है यही बयान कर चुके हम

इस दुनिया में नहीं हर कोई सनम

 

इसलिए

 

रिश्ते नाते वफ़ा या मोहब्बत

ना बनो इनमे किसी के भी भक्त

लगाओ मन प्रभु के चरणों में

नहीं रहा कुछ बाकी अब  झूठी कसमो में

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