महा मृत्युंजय

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शायद यह भगवान  की मर्ज़ी है की जिस बात की शुरुआत मैंने अंग्रेजी भाषा में की थी वह इन्टरनेट कनेक्शन की खामी के वजह से गायब  हो  गया और बदले में जो एक सोच मेरे ज़हन में उठी थी ,की उस ब्लॉग को  क्यूँ न मैं हिंदी में प्रस्तुत करू आप सबके लिए ..

खैर जैसे इश्वर की इच्छा जब बात उन्ही की हो रही है तो उन्ही के अनुसार हो …

भला अंग्रेजी  भाषा में क्या मिठास होगी, जो रस हिंदी में आता है वह अंग्रेजी में कभी आ ही नहीं सकता।

बीच में रुकने के लिए माफ़ कर दिजिये, पर एक बात फिर मन में उठ रही है ..सोचती हूँ पुछ ही डालू ..

 

वह यह की ..

” आपके विचार किस भाषा में सबसे ज्यादा सरलता एवं मौलिक रूप में प्रकट होते हैं , कोई एक नया विचार या ख्याल  क्या इसी भाषा में उत्पन्न होता है ” ?

हाँ की ना  ?  आप सहमत हो ही सकते है इस बात पर मेरे साथ और जो ना हो वह अपना तर्क ज़रूर रख सकते हैं इस विषय में की हिंदी अंग्रेजी पर भारी है

वापस आते हैं अपनी बात पर ..

यह  post  लिखने का मुख्य कारण है की मैं जिस शक्ति और भक्ति में विश्वास रखती हूँ, जिसकी   अनुभूति मैंने की है उस अनुभव का कुछ  भाग आप भी महसूस करे या अपने अनुभवों को भी इनसे जोड़ने और खोजने का प्रयास करे

मेरी नानी का हाँ मेरी नानी का बहुत बड़ा योगदान है इस भक्ति की शक्ति को मज़बूत करने में , कुछ नानी और कुछ मेरा इतिहास जो बहुत ही नाटकीय और बेहद गंभीर रहा है मेरे और मेरे परिजनों के लिए , उस सत्य से भी आपको मुखातिब करूंगी कभी

बचपन से ही मुझे ईश्वरीय शक्ति में बहुत रूचि थी, “रूचि” इसलिए क्यूंकि उस समय कोई नियम का पालन या किसी सधे हुए मार्ग पर नहीं चलना पड़ता था जबकि बड़े होने पर अनुशाशन हर ज़िन्दगी के पहलु में अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

बिना अनुशासन के तो भगवन ने किसी को दर्शन भी नहीं दिए, घोर जप, तप, आग्रह और निग्रह  से इश्वर प्रसन्न हुए है और होते आये है

धर्म को अनुभव करने से पहले उसकी स्वीकृती, फिर  उसकी अनुभूति से फिर उसके संस्करण से और बाद में अनुग्रहण से होता है

इस बात में तो सभी यकीन करते होंगे, की वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता पर यह मैंने जाना है की आप वक़्त और किस्मत पर भी विजयी हो सकते हैं अगर आप इश्वर की असीम शक्ति में विश्वास रखते है । इसके उदाहरण स्वरुप मैं एक कथा बताना चाहूंगी

भगवन शिव यानि महादेव को तो सब जानते हैं वह परमपिता परमेश्वर, जगत के स्वामी और सब देवो के देव है ..

कथा से पहले आपको यह बता दूँ की यह वह समय हैं

 

जब महादेव की अर्धांगिनी देवी पारवती, बाल्यवस्था में अपनी माता मैना देवी  के साथ मार्कंडय ऋषि के आश्रम में रहती थी और पारवती देवी एक दिन असुरो के कारन संकट में पढ़ गयी और महादेव ने उनके प्राणों की रक्षा की

मैना ने जब अपनी पुत्रि की जान पर आई आपदा के बारे में सुना तो वह अत्यंत दुखी और भयभीत हो गयी पर ऋषि मार्कंडय ने उन्हें जब बताया की कैसे महादेव ने देवी पारवती की रक्षा की, पर वह तब भी संतोष न कर सकी .

मैना देवी विष्णु भगवान की उपासक थी, जिस वजह से शिव की महिमा में ज़रा भी विश्वास नहीं रखती थी।

शिव जी ठहरे वैरागी और शमशान में रहने वाले तो भला वह कैसे उनकी पूजा करे

तत्पश्चात ऋषि मार्कंडय ने मैना को शिव भगवान की महिमा के बारे में बताने का विचार किया और उनको यह कथा विस्तार से बताई –

जब मार्कंडय ऋषि केवल 11  वर्ष के थे, तब उनके  पिता ऋषि मृकनडू को गुरुकूल आश्रम के  गुरु से यह ज्ञात हुआ की मार्कंडय की सारी  शिक्षा- दीक्षा पूर्ण हो चुकी है और अब वह उन्हें अपने साथ ले जा सकते है , क्यूंकि उन्होंने सारा ज्ञान इतने कम समय में ही अर्जित कर लिया और अब उनको और ज्ञान देने के लिए कुछ शेष नहीं है

यह जानने के बाद भी की उनका पुत्र मार्कंडय इतना बुद्धिमान और ज्ञानवान है, उनके  माता पिता खुश नहीं हुए । मार्कंडय ने जब पूछा की उनके दुःख का क्या कारन है, तब उनके पिता ने उनके जन्म की कहानी बताई की पुत्र की प्राप्ति हेतु  उन्होंने और उनकी माता ने कई वर्षो तक कठिन और घोर तप किया, तब  भगवान् महादेव प्रसन्न होकर प्रकट हुए, पर उनको इस बात से अवगत कराया की उनके भाग में संतान सुख नहीं है

परन्तु उनके तप से प्रसन्न होकर उनको पुत्र का वरदान दिया और उनसे पूछा की वह कैसा पुत्र चाहते है-

 

> जो बुद्धिवान ना हो पर उसकी आयु बहुत ज्यादा हो

या

> ऐसा पुत्र जो बहुत बुद्धिमान हो परन्तु जिसकी आयु बहुत कम हो

 

मृकंदु और उनकी पत्नी ने कम आयु वाला पर बुद्धिमान पुत्र, का वरदान माँगा,  महादेव ने उनको बताया की यह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा वह फिर विचार कर ले, पर उन्होंने वही माँगा और महादेव उनको वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गये।

ऋषि मृकंदु ने यह सब अपने पुत्र को बताया, जिसको सुनने के बाद वह बहुत दुःखी हुआ, यह सोचकर की वह अपने माता -पिता की सेवा नहीं कर सकेगा, परन्तु बालक मार्कंडय ने उसी समय यह निर्णय किया की वह अपनी  मृत्यू पर विजय प्राप्त करेंगे और भगवान शिव की पूजा से यह हासिल करेंगे ।

बालक मार्कंडय 11 वर्षः की आयु में वन को चले गए, लगभग 1 वर्ष के कठिन तप के दौरान उन्होंने एक नए मंत्र की रचना की जो म्रत्यु पर विजय प्राप्त कर सके

वह है-

” ॐ  त्रियम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं , उर्वारुकमिव बन्धनात  मृत्योर्मोक्षिय मामृतात् ॐ”

जब वह 12 वर्ष के हुए तब यमराज उनके सामने, प्राण हरण के लिए प्रकट हो गये .

बालक मार्कंडय ने यमराज को बहुत समझया और याचना की, कि वह उनके प्राण बक्श दे, परन्तु यमराज ने एक ना सुनी और और वह यमपाश के साथ उनके पीछे भागे बालक मार्कंडय भागते- भागते वन में एक शिवलिंग तक पहुचे जिसे देख कर वह उनसे लिपट गए और भगवान् शिव का मंत्र बोलने लगे जिसकी रचना उन्होंने स्वयं की थी.

यमराज ने बालक मार्कंडय की तरफ फिर से अपना यमपाश फेका परन्तु शिवजी तभी प्रकट हुए और उनका यमपाश अपने त्रिशूल से काट दिया .

बालक मार्कंडय शिवजी के चरणों में याचना करने लगे की वह उनको प्राणों का वरदान दे, परन्तु महादेव ने उनको कहा की उन्होंने ही यह वरदान उनके माता – पिता  को दिया था, इस पर बालक मार्कंडय कहते है की यह वरदान तो उनके माता पिता के लिए था नाकि उनके लिए ..

यह सुनकर महादेव बालक मार्कंडय से अत्यंत प्रसन्न होते है और उनको जीवन का वरदान देते है और यमराज को आदेश देते है की वह इस बालक के प्राण ना ले।

कथा से क्या इस बात पर पुन: विचार करने का मन होता है की भक्ति में बहुत शक्ति है , ऐसा क्या नहीं है जो इस संसार में इश्वर की भक्ति करने से प्राप्त ना किया जा सके।

मुझे इस कथा को जानने के पश्चात भगवान् की भक्ति और शक्ति की महिमा में अटूट विश्वास हुआ , इसके अलावा ऐसी कई महत्वपूर्ण कहानियां और घटनाएं है जो लोगो ने अपने जीवन में स्वयं अनुभव किया है  जिनके कारन वश उनका इश्वर मे विश्वास बड़ा है

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3 responses »

  1. aaj ka tohfa

    ये अक्ल भी क्या शय है जिसने दिल-ए-रंगी को
    ,
    हर बात पे रोका है हर काम पे टोका है

    आरास्ता-ए-मानी तक्हील है शायर का

    लफ्जों में उलजना फन काफ़िय गों का है

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